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ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

पोर्तो भारतियों के लिए यूरोप में घर जैसा शहर

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पुर्तगाल में भारतीयों का शहर यदि आप यूरोप में कहीं ऐसा शहर ढूँढ रहे हैं, जहाँ संस्कृति, इतिहास और भारतीय जुड़ाव तीनों मिलें, तो पोर्तो, पुर्तगाल आपके लिए सही जगह है। यहाँ की भारतीय समुदाय इसे भारतियों के लिए “घर जैसा” अनुभव देती है। पोर्तो में भारतीय छात्र, सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवर, व्यवसायी और उनके परिवार रहते हैं। शहर के विभिन्न हिस्सों में भारतीय किराना दुकानें, भोजनालय और सांस्कृतिक केंद्र देखने को मिलते हैं। यहाँ भारत के त्योहार जैसे दिवाली, होली और गणेश चतुर्थी भी बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। भारतीय समुदाय के कारण पोर्तो में आपको कहीं भी भारत की छोटी झलक मिल जाएगीचाहे वह मसालेदार खाना हो, योग कक्षा हो, या स्थानीय बाजार में भारतीय उत्पाद। यह एहसास पोर्तो को अन्य यूरोपीय शहरों से अलग बनाता है। पोर्तो की खूबसूरती और जीवनशैली पोर्तो का रिबेरा जिला रंगीन इमारतों और संकरी गलियों से भरा है। डॉम लुइस प्रथम पुल पर खड़ा होकर डोरू नदी की ताजगी और शहर की खूबसूरती देखना किसी सपना जैसा अनुभव है। पोर्तो का इतिहास, पुराने चर्च और साओ बेंटो रेलवे स्टेशन की मोज़ाइक कला इसे यूरोप के सबसे आकर्षक श...

चेट्टीनाड : भीड़ से दूर भारत की असली खूबसूरती

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  chettinad havelis architecture तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्से में बसा चेट्टीनाड भारत के उन चुनिंदा इलाकों में से एक है, जहाँ आधुनिकता पहुँच तो गई है, लेकिन परंपराएँ अब भी पूरी गरिमा के साथ जीवित हैं। यह जगह शोर-शराबे वाले पर्यटन स्थलों से बिल्कुल अलग है। यहाँ सब कुछ ठहराव में है हवाएँ, गलियाँ और लोग। चेट्टीनाड की सबसे बड़ी पहचान इसकी भव्य हवेलियाँ हैं। इन हवेलियों को नट्टुकोट्टई चेट्टियार समुदाय ने बनवाया था, जो कभी अंतरराष्ट्रीय व्यापारी हुआ करते थे। इन घरों की बनावट में दुनिया की झलक दिखाई देती है। कहीं इटली का संगमरमर है, तो कहीं बर्मा की सागौन लकड़ी। Read Also : पुदुचेरी, जिसे पहले पांडिचेरी के नाम से जाना जाता था  बेल्जियम के शीशे और जापान की टाइलें इन हवेलियों को किसी संग्रहालय जैसा बना देती हैं। हर दरवाज़ा, हर आंगन अपने भीतर एक कहानी छुपाए हुए है। अगर वास्तुकला आँखों को तृप्त करती है, तो चेट्टीनाड का खाना आत्मा को। यहाँ का भोजन अपने तीखे और गहरे स्वाद के लिए जाना जाता है। मसालों का ऐसा संतुलन यहाँ देखने को मिलता है जो कहीं और मुश्किल से मिलता है। चेट्टीनाड चिकन, पेपर चिकन...

बसंती आभा में सराबोर आगरा का 'दयामय' dayalbagh

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  ताजनगरी आगरा का दयालबाग क्षेत्र बसंत पंचमी के पावन अवसर पर एक अलग ही आध्यात्मिक छटा बिखेरता नजर आता है। यहाँ बसंत केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि श्रद्धा और सेवा का संगम है। राधास्वामी मत के अनुयायियों के लिए यह दिन ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि 20 जनवरी 1915 को बसंत के दिन ही पांचवें आचार्य हुजूर साहब महाराज ने 'मुबारक कुआं' के पास शहतूत का पौधा लगाकर इस पवित्र कॉलोनी की नींव रखी थी। साथ ही, इसी दिन राधास्वामी मत के संस्थापक परम पुरुष पूरन धनी स्वामीजी महाराज ने सन 1861 में पहली बार सार्वजनिक सत्संग की शुरुआत की थी, जिसे राधास्वामी संवत के अनुसार नए वर्ष का शुभारंभ भी माना जाता है। उत्सव की शुरुआत तड़के सुबह से ही खेतों में होने वाले शब्द-पाठ और सामूहिक श्रमदान से होती है, जहाँ बच्चे, बूढ़े और जवान सभी पीले वस्त्रों में सजकर सेवा कार्य में जुट जाते हैं। पूरा वातावरण 'ऋतु बसंत अब आई' के मधुर स्वरों से गूंज उठता है।  रिपोर्ट के अनुसार, दयालबाग की गलियाँ और संस्थान पीले फूलों और आकर्षक सजावट से सज जाते हैं। रात के समय पूरे क्षेत्र को रंग-बिरंगी रोश...

हिमालय की गोद में बसती विरासत: लद्दाख की कला, शिल्प और संस्कृति की अनकही कहानी

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 लद्दाख भारत का वह अनोखा क्षेत्र है जहाँ प्रकृति, अध्यात्म और परंपरा एक साथ सांस लेते प्रतीत होते हैं। कश्मीर का मुकुट कहलाने वाला लद्दाख अपनी विशिष्ट कला, शिल्प और संस्कृति के लिए विश्वभर में जाना जाता है। हिमालय की ऊँची चोटियों के बीच बसे इस क्षेत्र ने अपनी कठोर जलवायु के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को आज भी जीवित रखा है। यहाँ की कला और संस्कृति में तिब्बती प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो इसे भारत के अन्य हिस्सों से अलग और विशेष बनाता है। लद्दाख की कला मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और प्रकृति से जुड़ी हुई है। यहाँ की प्रसिद्ध थंगका चित्रकला बौद्ध धर्म से प्रेरित होती है। थंगका चित्रों में भगवान बुद्ध, बोधिसत्व और मंडलों का चित्रण किया जाता है, जिन्हें ध्यान और साधना के लिए उपयोग किया जाता है। ये चित्र प्राकृतिक रंगों से बनाए जाते हैं और इनका निर्माण अत्यंत धैर्य और साधना का कार्य माना जाता है। लद्दाख की दीवार चित्रकला भी मठों और गोम्पाओं में देखने को मिलती है, जो वहाँ की आध्यात्मिक परंपरा को दर्शाती है। लद्दाख का हस्तशिल्प भी अपनी अनूठी पहचान रखता है। यहाँ के लोग ऊन से बने व...

हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग की शुरुआत लगभग 300 साल पहले हुई थी जयपुर में

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  jaipur hand block printing history जयपुर में हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग का इतिहास केवल एक शिल्प की कहानी नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान, व्यापारिक परंपराओं और कारीगरों की पीढ़ियों से चली आ रही मेहनत का जीवंत प्रमाण है। इतिहासकारों और वस्त्र शोधकर्ताओं के अनुसार जयपुर क्षेत्र में हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग की व्यवस्थित शुरुआत लगभग सत्रहवीं शताब्दी के अंत में मानी जाती है, यानी आज से करीब तीन सौ से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले। उसी समय आमेर और बाद में स्थापित हुए जयपुर राज्य ने इस कला को संरक्षण देना शुरू किया। Read Also : ग्रीस में 3,100 से अधिक 100 साल की उम्र वाले लोग: लंबी उम्र का रहस्य राजपूत शासकों के काल में हाथ से छपे वस्त्रों को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। ये कपड़े केवल पहनावे तक सीमित नहीं थे, बल्कि महलों की सजावट, पूजा-पाठ और राजकीय उपहारों का भी अहम हिस्सा थे। लगभग तीन सौ वर्ष पहले शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे जयपुर की पहचान बन गई और कारीगरों के पूरे समुदाय इसी कला के इर्द-गिर्द विकसित होने लगे। मुगल प्रभाव के साथ जयपुर की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग में बारीकी और सौंदर्य का नया स्...

बसंत पंचमी: ज्ञान, उल्लास और नवचेतना का पर्व

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  23 जनवरी 2026 को बसंत पंचमी का पावन पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह दिन प्रकृति के नवजीवन, ज्ञान की आराधना और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। शीत ऋतु की विदाई और बसंत के आगमन के साथ ही वातावरण में एक नई ताजगी, उल्लास और सृजनशीलता का संचार होता है। खेतों में लहलहाती सरसों, पेड़ों पर नई कोंपलें और हवाओं में घुली हल्की सुगंध इस बात का संकेत देती है कि प्रकृति मुस्कुरा उठी है। बसंत पंचमी का विशेष महत्व मां सरस्वती की उपासना से जुड़ा है। इस दिन विद्या, बुद्धि, कला और संगीत की देवी सरस्वती की आराधना की जाती है। विद्यार्थी, कलाकार और ज्ञान साधक इस दिन विशेष श्रद्धा के साथ मां सरस्वती से प्रज्ञा और सफलता का आशीर्वाद मांगते हैं। पीले वस्त्र धारण करना, पीले पुष्प अर्पित करना और पीले व्यंजनों का सेवन इस पर्व की विशिष्ट पहचान है, क्योंकि पीला रंग उत्साह, समृद्धि और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मक सोच और नए आरंभ का संदेश भी देता है। बसंत पंचमी हमें यह सिखाती है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को...

कुल्लू घाटी: प्रकृति की गोद में बसी स्वर्ग-सी धरती

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 हिमाचल प्रदेश की हरी-भरी वादियों में बसी कुल्लू घाटी भारत की उन अनमोल धरोहरों में से एक है, जहाँ प्रकृति अपनी सम्पूर्ण सुंदरता के साथ मुस्कराती नज़र आती है। ब्यास नदी के किनारे फैली यह घाटी बर्फ से ढकी चोटियों, देवदार के घने जंगलों, सेब के बागानों और शांत वातावरण के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। कुल्लू को अक्सर “देवताओं की घाटी” कहा जाता है। यहाँ छोटे-बड़े अनेक मंदिर हैं, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। रघुनाथ जी मंदिर कुल्लू का प्रमुख धार्मिक केंद्र है, जहाँ हर वर्ष ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक-आस्था और परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ कुल्लू रोमांच प्रेमियों के लिए भी स्वर्ग है। यहाँ रिवर राफ्टिंग, ट्रेकिंग, पैराग्लाइडिंग और कैंपिंग जैसे साहसिक खेल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मनाली के पास स्थित सोलंग घाटी और रोहतांग दर्रा इस क्षेत्र की लोकप्रिय पहचान हैं। कुल्लू घाटी की संस्कृति सरल, आत्मीय और रंगों से भरी हुई है। यहाँ के लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक ...

चेन्नई Marena beach: समुद्र, संस्कृति और संघर्ष की सीख

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  चेन्नई—भारत के दक्षिण में बसा वह शहर, जहाँ समुद्र की लहरों के साथ जीवन की लय भी बहती है। मेरा बचपन चेन्नई की उन्हीं गलियों, मंदिरों की घंटियों, और मरीना बीच की नम हवा के बीच बीता। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि चेन्नई ने मुझे सिर्फ़ जगह नहीं दी, बल्कि सोच और संस्कार भी दिए। सुबह-सुबह फ़िल्टर कॉफी की खुशबू और अख़बार की सरसराहट से दिन की शुरुआत होती थी। स्कूल की वर्दी पहनकर साइकिल से निकलना, रास्ते में इडली–डोसा की दुकानों से आती खुशबू, और दोस्तों के साथ तमिल–हिंदी का मिला-जुला संवाद—ये सब मेरी यादों का अभिन्न हिस्सा हैं। मरीना बीच मेरे बचपन का सबसे बड़ा मैदान था। रेत पर दौड़ना, लहरों से डरते-डरते पास जाना, और शाम को डूबते सूरज को देखना—यहीं मैंने धैर्य और विनम्रता सीखी। समुद्र सिखाता है कि शोर के बावजूद शांति कैसे रखी जाए। चेन्नई की संस्कृति ने मुझे विविधता का सम्मान करना सिखाया। पोंगल की मिठास, भरतनाट्यम की लय, और मंदिरों की वास्तुकला—हर अनुभव ने मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया। यहाँ की गर्मी ने सहनशीलता सिखाई और यहाँ के लोगों ने सरलता। आज भले ही मैं कहीं और हूँ, लेक...

केरल बैकवॉटर्स जहाँ प्रकृति और शांति एक साथ बहती हैं

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  केरल बैकवॉटर्स प्रकृति और शांति का संगम हैं जहाँ पानी हरियाली और सुकून एक साथ बहते हैं यह जगह उन लोगों के लिए है जो भीड़भाड़ और शोर से दूर कुछ पल अपने साथ बिताना चाहते हैं यहाँ की नहरें झीलें और धीमी चलती हाउसबोट जीवन को थोड़ी देर के लिए थाम लेने का मौका देती हैं।  केरल बैकवॉटर्स कोई साधारण पर्यटन स्थल नहीं हैं यह एक अनुभव है जो धीरे धीरे भीतर उतरता है यहाँ जीवन की रफ्तार धीमी हो जाती है और शांति अपने आप महसूस होने लगती है चारों ओर फैला शांत पानी नारियल के पेड़ों की कतारें और हवा में घुली नमी मन को किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाती है । केरल बैकवॉटर्स झीलों नहरों और नदियों का विशाल जाल हैं जो अरब सागर के समानांतर फैला हुआ है यह जलमार्ग सदियों से यहाँ के लोगों के जीवन का हिस्सा रहे हैं आज भी इन रास्तों से गाँव खेत और छोटे कस्बे जुड़े हुए हैं । बैकवॉटर्स की असली पहचान हाउसबोट हैं लकड़ी और बाँस से बनी ये नावें पानी पर तैरते घर जैसी लगती हैं जब हाउसबोट धीरे धीरे आगे बढ़ती है तो बाहर का शोर कहीं पीछे छूट जाता है सुबह पानी की हल्की लहरों के साथ चाय पीना दोपहर में ठंडी हवा में आराम ...